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🕉 *महाशिवरात्रि*🕉 *महाशिवरात्रि इस बार 4 मार्च सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन सर्वार्थसिद्धि योग व श्रवण नक्षत्र का श्रेष्ठ संयोग बन रहा है। इस दिन विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।*  *4 मार्च को सुबह 6.52 से दोपहर 12.30 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग है।* *दोपहर 12.10 बजे तक श्रवण नक्षत्र है। शाम 4.29 बजे तक त्रियोदशी है। इसके बाद चतुर्दशी प्रारंभ होगी। इस कारण इस बार शिवरात्रि को सोमवार होने के अलावा सर्वार्थ सिद्धि व श्रवण नक्षत्र का भी विशेष योग बन रहा है। इस कारण इस बार 4 मार्च को शिवरात्रि मनाई जाएगी। यह योग सभी कार्यों में सफलता, धन संपत्ति, सुख व प्रेम प्रदान करने वाला है। इस दिन श्रद्धालुओं को भगवान शिव की विधि-विधान के साथ पूजा कर उपवास रखना चाहिए। चार प्रहर की पूजा का भी विशेष महत्व है ।* *रुद्राभिषेक भगवान शिव को प्रसन्न करने का सबसे सरल एवम प्रभावी उपाय है।  शिवरात्रि के दिन यदि रुद्राभिषेक किया जाये तो इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। रुद्राभिषेक का अर्थ है भगवान रुद्र का अभिषेक अर्थात शिवलिंग पर रुद्र के मंत्रों के द्वारा ...

महाशिवरात्रि

4 मार्च, सोमवार को महाशिवरात्रि है। सोमवार और शिवरात्रि का शुभ योग होने से इस दिन का महत्व काफी अधिक बढ़ गया है। इस दिन शिव-पार्वती की विशेष पूजा करनी चाहिए। शिवरात्रि पर पति-पत्नी एक साथ शिव-पार्वती की पूजा करेंगे तो उनके वैवाहिक जीवन की परेशानियां दूर हो सकती हैं। शिवरात्रि पर शिवजी को चढ़ाना चाहिए 15 चीजें चंदन, धतूरा, चावल, आंकड़े के फूल, बिल्वपत्र, जनेऊ, प्रसाद के लिए फल, दूध, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, मिश्री, पान, दक्षिणा पूजा में शिवलिंग पर जरूर चढ़ाएं। शिव मंत्र : ऊँ ह्रीं नमः शिवायै च नमः शिवाय 108 बार करना है। शिव पूजा की 11 स्टेप्स 1. इस दिन पति-पत्नी घर के मंदिर में शिव-पार्वती के सामने पूजा करने का संकल्प करें। यानी इस दिन आपको एक साथ शिव-पार्वती की पूजा करनी है, इस बात का संकल्प करना है। 2. घर में मंदिर में या किसी अन्य मंदिर में शिव-पार्वती की पूजा का प्रबंध करें। पति-पत्नी आसन पर बैठें और सबसे पहले गणेशजी का पूजन करें। पत्नी को पति के बाएं हाथ की ओर बैठना चाहिए। 3. गणेशजी को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, हार-फूल, चावल, प्रसाद, जनेऊ आदि ...

माघ संकष्ठी व्रत

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राधेकृष्णा जी  सकट चौथ का महत्व 24 जनवरी 2019 सकट चौथ पूरे साल में पड़ने वाली 4 बड़ी चतुर्थी तिथियों में से एक है। सकट चौथ पर सुहागन स्त्रियां सुबह-शाम गणेशजी की पूजा करती है और रात में चंद्रमा के दर्शन और पूजा करने के बाद पति का आशीर्वाद लेती हैं। इसके बाद व्रत खोला जाता है। इस तरह व्रत करने से दाम्पत्य जीवन में कभी संकट नहीं आता। पति की उम्र बढ़ती है और शादीशुदा जीवन में प्रेम के साथ सुख भी बना रहता है। इस व्रत को करने से पति के सारे संकट भी दूर हो जाते हैं। सकट चौथ की कथा सतयुग में राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। एक बार तमाम कोशिशों के बावजूद जब उसके बर्तन कच्चे रह जा रहे थे तो उसने यह बात एक पुजारी को बताई। उस पर पुजारी ने बताया कि किसी छोटे बच्चे की बलि से ही यह समस्या दूर हो जाएगी। इसके बाद उस कुम्हार ने एक बच्चे को पकड़कर भट्टी में डाल दिया। वह सकट चौथ का दिन था। काफी खोजने के बाद भी जब उसकी मां को उसका बेटा नहीं मिला तो उसने गणेश जी के समक्ष सच्चे मन से प्रार्थना की। उधर जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो भट्टी में उसके बर्तन तो पक गए लेकिन बच्चा...
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*स्वास्तिक की महिमा -*  *स्वास्तिक - अर्थ - महत्त्व -  रहस्य -  लाभ उठाने के तरीके? -* स्वस्तिक अत्यन्त प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति में मंगल-प्रतीक माना जाता रहा है। इसीलिए किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले स्वस्तिक चिह्व अंकित करके उसका पूजन किया जाता है। आज हम इसका अर्थ, महत्व और उपयोग के बारे में कुछ दुर्लभ जानकारियां देंगे. अर्थ : स्वस्तिक शब्द सु+अस+क से बना है। 'सु' का अर्थ अच्छा, 'अस' का अर्थ 'सत्ता' या 'अस्तित्व' और 'क' का अर्थ 'कर्त्ता' या करने वाले से है। इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द का अर्थ हुआ 'अच्छा' या 'मंगल' करने वाला। 'अमरकोश' में भी 'स्वस्तिक' का अर्थ आशीर्वाद, मंगल या पुण्यकार्य करना लिखा है। अमरकोश के शब्द हैं - 'स्वस्तिक, सर्वतोऋद्ध' अर्थात् 'सभी दिशाओं में सबका कल्याण हो।' इस प्रकार 'स्वस्तिक' शब्द में किसी व्यक्ति या जाति विशेष का नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व के कल्याण या 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना निहित है। 'स्वस्तिक' शब्द की...
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🌷 *भैरव अष्टमी - 29 नवंबर दिन गुरुवार* 🌷 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कालभैरव का अवतार लिया था। इसलिए इस पर्व को कालभैरव जयंती को रूप में मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 29 नवंबर 2018, दिन गुरुवार को है । यह दिन भगवान भैरव और उनके सभी रूपों के समर्पित होता है। भगवान भैरव के मुख्य 8 रूप माने जाते हैं। उन रूपों की पूजा करने से भगवान अपने सभी भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें अलग-अलग फल प्रदान करते हैं। *भगवान भैरव के 8 रूप* *1. कपाल भैरव* इस रूप में भगवान का शरीर चमकीला है, उनकी सवारी हाथी है । कपाल भैरव एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में तलवार तीसरे में शस्त्र और चौथे में पात्र पकड़े हैं। भैरव के इन रुप की पूजा अर्चना करने से कानूनी कारवाइयां बंद हो जाती है । अटके हुए कार्य पूरे होते हैं । *2. क्रोध भैरव* क्रोध भैरव गहरे नीले रंग के शरीर वाले हैं और उनकी तीन आंखें हैं । भगवान के इस रुप का वाहन गरुण हैं और ये दक्षिण-पश्चिम दिशा के स्वामी माने जा...
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मौली क्या है, क्यों है इसका इतना धार्मिक महत्व.......... येन बद्धो बलीराजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल।। मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं। मौली का अर्थ : 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है। मौली बांधने का मंत्र : ‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’...
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ये 15 तरह के दीपक आपके हर तरह के कष्टों को दूर कर देंगे दीपावली पर अकसर चारों ओर दीपक जलाए जाते हैं, हालांकि सभी घरों में दीपावली के अलावा प्रतिदिन पूजाघर में दीपक जलाए जाने का प्रचलन है। दीपक जलाना बहुत ही शुभ होता है। कहते हैं कि इसको जलाने के कई तरह के कष्ट दूर होते हैं। आओ जानते हैं दीपक के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां। दीपक कई प्रकार के होते हैं, जैसे चांदी के दीपक, मिट्टी के दीपक, लोहे के दीपक, ताम्बे के दीपक, पीतल की धातु से बने हुए दीपक तथा आटे से बनाए हुए दीपक। दीपावली पर मिट्टी के दीपक ही जलाने का महत्व है। मिट्टी के दीपक अधिक शुभ होते हैं। आओ जानते हैं कि कौन-सा दीप किस हेतु जलाया जाता है? 1. आटे का दीपक किसी भी प्रकार की साधना या सिद्धि हेतु आटे का दीपक बनाते हैं और इसे ही पूजा करने के लिए सबसे उत्तम मानते हैं। 2. घी का दीपक आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने के लिए रोजाना घर के देवालय में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे देवी-देवता भी प्रसन्न होते हैं। आश्रम तथा देवालय में अखंड ज्योत जलाने के लिए भी शुद्ध गाय के घी का या तिल के तेल का उपयोग किया जाता है। ...